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1.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच सोमवार को होने वाली शिखर वार्ता में दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों को पूरी तरह सामान्य बनाने की प्रतिबद्धता दोहराने जा रहे हैं। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में रिश्तों पर जमी बर्फ के बाद यह बैठक संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में अहम कदम होगी। बैठक का फोकस वर्ष 2023 से पहले द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देने के लिए चल रही वार्ता प्रक्रिया, पहलों और संधियों को नए जोश और स्पष्ट लक्ष्यों के साथ फिर से शुरू करने पर होगा। दोनों पक्ष ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, परमाणु सहयोग और व्यापार जैसे क्षेत्रों में संस्थागत संवाद तंत्र को पुनर्जीवित करने की हामी भरेंगे, द्विपक्षीय कारोबार के नए लक्ष्य तय करेंगे और आतंकवाद को लेकर एक-दूसरे की चिंताओं को समझने की कोशिश करेंगे।
2.
नीले समंदर, स्वच्छ रेत और समृद्ध प्राकृतिक धरोहर से सजे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में बीते दस साल में पर्यटन ने अभूतपूर्व छलांग लगाई है। कनेक्टिविटी, डिजिटल नेटवर्क, एयरपोर्ट विस्तार और इको-टूरिज्म परियोजनाओं पर किए गए बड़े निवेश ने इस द्वीपीय क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है। इससे जहां पर्यटकों की संख्या में तीन गुना से अधिक वृद्धि हुई है, वहीं रोजगार के अवसर भी सृजित हुए हैं। वर्ष 2015 के आसपास जहां करीब तीन लाख पर्यटक अंडमान-निकोबार पहुंचे थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 10 लाख से अधिक हो गई। बेहतर हवाई संपर्क, द्वीपों के बीच तेज फेरी व हेलीकाप्टर सेवाएं और आनलाइन पर्यटन सुविधाओं ने पर्यटन को उड़ान दी है।
3.
भारत की विदेश नीति में 'रणनीतिक स्वायत्तता' का सिद्धांत बरकरार है। 'रणनीतिक अस्पष्टता का युग समाप्त हो रहा है। उसकी जगह ले रही है एक ऐसी 'रणनीतिक स्पष्टता', जो यथार्थवाद, साझा हितों और दीर्घकालिक दृष्टि पर आधारित है। भारत इसी के आधार पर तमाम देशों से अपने रिश्तों को आकार दे रहा है।
4.
इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा अभियान में ईरान पर हमला बोल ही दिया। हमले के शुरुआती दौर में ही ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत से दोनों देशों ने अपने इरादे पूरी तरह जाहिर कर दिए थे। स्पष्ट है कि उन्होंने ईरान में विध्वंस ही नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की जिद को अपना लक्ष्य बना लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो ईरान की जनता का आह्वान तक कर दिया है कि अपने देश की कमान अपने हाथ में लीजिए और ऐसा मौका फिर पता नहीं कब मिले। देखा जाए तो ईरान पर यह हमला किसी आसन्न खतरे से अधिक अमेरिकी सत्ता
प्रतिष्ठान के राजनीतिक गुणा-गणित, इजरायल की सुरक्षा चिंताओं और तथाकथित डोनरो सिद्धांत की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है। डोनरो सिद्धांत के जरिये ट्रंप अमेरिकी प्रभुत्व का व्यापक विस्तार करना चाहते हैं। साल की शुरुआत में वेनेजुएला में तख्तापलट और ग्रीनलैंड को लेकर कड़े तेवर इसी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। इसी कड़ी में अब ईरान पर बड़ा हमला किया गया है।
5.
भारत की न्याय व्यवस्था आज केवल लंबित मुकदमों की समस्या तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह न्याय-क्षमता और शासन क्षमता के बीच बढ़ते असंतुलन की एक बड़ी कहानी बन गई है। दिसंबर 2025 तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले पांच वर्षों में जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 4.11 करोड़ से बढ़कर 4.80 करोड़ हो गई है। इसी अवधि में उच्च न्यायालयों में लंबित मामले 53.1 लाख से बढ़कर 63.3 लाख और सर्वोच्च न्यायालय में यह संख्या 70 हजार से बढ़कर लगभग 90.7 हजार तक पहुंच गई है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में औसतन प्रति वर्ष 193 कार्य दिवस हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में 215 और ट्रायल कोर्ट (अधीनस्थ न्यायालयों) में 245 दिन काम होता है। भारत उन देशों में शुमार है जहां की न्यायपालिका साल में सर्वाधिक दिन कार्य करती है। अमेरिका में यह अवधि मात्र 79 दिन है, जबकि आस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर और ब्रिटेन की शीर्ष अदालतें क्रमशः 97, 120, 145 और 189 दिन ही बैठती हैं। भारत का सर्वोच्च न्यायालय प्रतिदिन औसतन 10 से 15 फैसले सुनाता है, जबकि इसके विपरीत अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पूरे एक वर्ष में अधिकतम 10 से 15 निर्णय ही देता है।
6.
भारत की विविध भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं में नामों का विशेष महत्व रहा है। किसी राज्य या क्षेत्र का नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं होता, बल्कि वह इतिहास, भाषा और सामाजिक स्मृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। इसी संदर्भ में दक्षिण भारत के राज्य केरल का आधिकारिक नाम बदलकर 'केरलम' किए जाने का प्रस्ताव हाल के दिनों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह निर्णय सांस्कृतिक अस्मिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इतिहास की दृष्टि से देखें तो 'केरल' शब्द मलयालम के मूल रूप 'केरलम' से ही विकसित हुआ है। लोकप्रिय लोकव्युत्पत्ति इसे 'केरा' (नारियल) और 'अलम' (भूमि) से भी जोड़ती है। अर्थात 'नारियलों की भूमि'।
7.
पश्चिम एशिया एक बार फिर से वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बन गया है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता टकराव क्षेत्रीय प्रभुत्व, परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था के प्रश्नों को तीखा कर रहा है। तेल आपूर्ति मार्ग, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र की समुद्री गतिविधियां अब इससे दुष्प्रभावित होंगी। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की अस्थिरता वैश्विक आर्थिक संरचना के लिए बड़ी चुनौती बनेगी, जिसका असर भारत जैसे देशों पर सीधा देखा जाएगा। ऐसे में भारत को बहुत सोच-समझकर आगे बढ़ना होगा।
8.
फरवरी में 17 माह के उच्चस्तर पर रहा एफपीआइ निवेश
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआइ) ने 17 महीनों में सबसे ज्यादा फरवरी में 22,615 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता, घरेलू बाजार के मूल्यांकन में कमी और कंपनियों के तीसरी तिमाही के बेहतर नतीजों के चलते विदेशी निवेशक एक बार फिर से भारतीय बाजारों की तरफ आकर्षित हुए हैं। फरवरी में खरीदारी से पहले लगातार तीन माह तक एफपीआइ बिकवाल रहे थे।
9.
रविवार को ओवर द काउंटर ब्रेंट क्रूड आयल 10 प्रतिशत बढ़कर लगभग 80 डालर प्रति बैरल हो गया। हालांकि, विश्लेषकों ने आशंका जताई है कि ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद क्रूड की कीमतें 100 डालर तक बढ़ सकती है। कच्चे तेल में ओवर द काउंटर का मतलब है कि जब खरीदार और विक्रेता किसी केंद्रीय एक्सचेंज (जैसे एमसीएक्स या एनवाईएमईएक्स) के बजाय सीधे आपस में सौदा करते हैं। यह एक विकेंद्रीकृत व्यापार है, जहां डिलीवरी की तारीख, तेल की मात्रा और कीमत को दोनों पक्ष अपनी सुविधा अनुसार तय करते हैं।

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